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द्वन्द से संतोष तक...........

Posted On: 15 Jan, 2011 में

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द्वन्द के उपरांत,

विश्राम के समय……..

शिथिल शरीर ने

धीरे से करवट ली |

पल भर, सुख संग,

संतोष की गहरी श्वास ने

निद्रा द्वार तक पहुँचाया …………..|

पर वो क्या था……….

जिसे मैंने सुना तो,

पर ध्यान नहीं दिया ………|

कुछ इस तरह ………..

सुख मत खोजो |

यथार्थ में जियो |

सामान्य में चलो |

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

razia mirza listenme के द्वारा
March 22, 2011

कुछ इस तरह ……….. सुख मत खोजो | यथार्थ में जियो | सामान्य में चलो | वाह !! सामान्य सी पर बहोत समझदारी की बात कह दी आपने

yogita singh के द्वारा
January 20, 2011

क्या बात क्या बात

rajkamal के द्वारा
January 17, 2011

पर वो क्या था………. जिसे मैंने सुना तो, पर ध्यान नहीं दिया priy दानिश जी …नमस्कार ! सुंदर रचना …लेकिन उपरलिखित पंक्तियों का अर्थ बताने की किरपा करे …. धन्यवाद

    danishmasood के द्वारा
    January 18, 2011

    राज कमल जी बड़ा मुश्किल है यह समझना की आप व्यंग कर रहे हैं या प्रश्न | यदि आप को कविता अच्छी लगी तो बहुत बहुत धन्यवाद नहीं तो धन्यवाद |

danishmasood के द्वारा
January 16, 2011

वाजपेयी जी आज पहली बार अपनी कविता पे किया गया कमेन्ट बहुत अच्छा और सच्चा लगा |ऐसी ही प्रतिक्रया की आवश्यकता है जहाँ सीखने की सम्भावना तो है | रही बात मेरी कविता के दर्शन की तो इसमें मेरा द्रष्टिकोण सुख की कामना नहीं अपितु निरंतर अनंत सुख का विश्वास है | आगे भी मार्गदर्शन का इच्छुक दानिश

    sdvajpayee के द्वारा
    January 16, 2011

    भाई जी, अनुभवजन्‍य तो नहीं  लेकिन सुना है और मानता भी हूं कि अनंत सुख तो ‘किसी’ का हो जाने, बन जाने, में ही है। क्‍यों कि ‘वह सुख- रूप , सुख निधान है। निरंतर अनंत यानी आत्‍यंतिक सुख की कामना को ज्ञानीजन सर्वोत्‍तम कामना बताते हैं।

    danishmasood के द्वारा
    January 17, 2011

    बाजपेयी जी आपके विचारों से मैं पूर्ण सहमत हूँ मुझमे आप की बात का खंडन करने की क्षमता नहीं है | यह सत्य है की कामना ही प्रयास की जननी है| किन्तु मेरा उद्देश्य व्यक्ति की कामना को उजागर करना नहीं अपितु सौ प्रतिशत सुख प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करना है | यदि मेरा द्रष्टिकोण गलत है तो कृपया मार्गदर्शन करें |

sdvajpayee के द्वारा
January 16, 2011

  श्री दानिश भाई,  ’सुख मत खोजो |यथार्थ में जियो |सामान्य में चलो |’ के संदेश-दर्शन में भी तो सुख-कामना है। सामान्‍य में चलो यानी सम रहने में दुखानुभूति नहीं होती।दुख का अभाव सुख का जनक है।

vandanapushpender के द्वारा
January 16, 2011

बहुत ही सुन्दर रचना है आप की दानिश मसूद जी, जो कम शब्दों में भी अपना कारगर असर छोडती है | बधाई स्वीकारें |

    danishmasood के द्वारा
    January 16, 2011

    धन्यवाद वंदना जी

HIMANSHU BHATT के द्वारा
January 16, 2011

दानिश जी कम शब्दों में आप सब कुछ कह गए हो….. यथार्थ में जियो…. सामान्य में चलो.

    danishmasood के द्वारा
    January 16, 2011

    धन्यवाद हिमांशु जी

roshni के द्वारा
January 16, 2011

दानिश जी बहुत अच्छी रचना

    danishmasood के द्वारा
    January 16, 2011

    रोशनी जी धन्यवाद

abodhbaalak के द्वारा
January 16, 2011

गागर में सागर है आपकी ये रचना दानिश जी बहुत सुन्दर http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    danishmasood के द्वारा
    January 16, 2011

    आबिद जी धन्यवाद

    danishmasood के द्वारा
    January 16, 2011

    अबोध जी धन्यवाद नाम की गलती धोखे से हुई है उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ

    abodhbaalak के द्वारा
    January 16, 2011

    chaliye aapko maaf bhi kia aur aapka ek kament aur badha dia LOL http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

nishamittal के द्वारा
January 16, 2011

दानिश जी अच्छी रचना है आपकी.

    danishmasood के द्वारा
    January 16, 2011

    निशा जी आप का धन्यवाद

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 15, 2011

सुख मत खोजो | यथार्थ में जियो | सामान्य में चलो | सही कहा…… ये सुख की खोज ही दुख का असली कारण है………..

    danishmasood के द्वारा
    January 16, 2011

    धन्यवाद पियूष जी


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