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अंकुर

Posted On: 2 Jan, 2011 में

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बीती रात जब सपना टूटा,

जाने किस भय से पीछा छूटा………..

परिश्रम से आई शिथिलता ने

यूँ ही कुछ बुना होगा………..?

सम्भवता नए अंकुर ने जन्म लिया होगा………..?

काश पूर्णस्पष्ट होता ||

चाहे जो भी भाषा थी

पर नई किरण की आशा थी………..

समय करवट ले रहा था,

युवा एक दिशा में बह रहा था………..|

सबकी एक ही परिभाषा थी,

पुष्प की अभिलाषा थी…….. |

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajkamal के द्वारा
January 5, 2011

danish ji ..adaab ! अच्छी कविता है …. उम्मीद करता हूँ की अगली बार ‘वोह’ पूर्ण स्पष्ट होगी

vinay shukla के द्वारा
January 3, 2011

खूबसूरत कविता पुष्प की अभिलाषा थी…… वाह भाई वाह बहुत अच्छे दानिस जी

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 3, 2011

खूबसूरत कविता …………. हार्दिक बधाई……..

nishamittal के द्वारा
January 3, 2011

कविता के लिए बधाई.नववर्ष पर भी शुभकामनाएं आपके सभी स्वप्न साकार हों. देरी का कारण नेट समस्या.

    danishmasood के द्वारा
    January 3, 2011

    धन्यवाद आप को भी नव वर्ष की शुभकामनायं रचना और शैली में किस तरह के परिवर्तन की आवश्यकता है आपसे मार्ग दर्शन की अपेक्षा है

abodhbaalak के द्वारा
January 2, 2011

जनाब, नए साल की पहली कविता पर पहला कमेन्ट, मुबारक हो और साथ में नया साल भी ऐसे भी आप हमें अपने जैसा मान कर हमें इज्ज़त बक्श चुके हैं ….. कहीं मई उल्टा तो नहीं कह रहा हूँ नए साल के ढेरो बन्धाइओन के साथ http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    danishmasood के द्वारा
    January 2, 2011

    अबोध जी धन्यवाद, आप को भी नव वर्ष की शुभकामनायं रचना से सम्बंधित टिप्पणी की भी अत्यंत आवश्यकता हैं ……………


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